Saturday, June 28, 2008
ये सेहत की दुकान है
अस्पताल पहुंचने से पहले सुबह नौ बजे हमने फोन पर बात की थी। तब रिसेप्शन पर तैनात शख़्स ने बताया कि विप्लव जी के लिए कमरा नंबर १०१ तैयार है। वो जब चाहें आ कर अस्पताल में भर्ती हो सकते हैं। लेकिन वहां पहुंचने पर कमरा देने की जगह इंतजार करने को कहा गया। करीब एक घंटे बाद अस्पताल के एक कर्मचारी ने आकर साथ चलने को कहा। उसके साथ हम लिफ्ट में दाखिल हुए। थोड़ी देर में हम अस्पताल की तीसरी मंजिल पर थे। वहां वो कर्मचारी हमें रिकवरी रूम में ले गया, जहां दो बिस्तर लगे हुए थे। एक बिस्तर पर एक मरीज दर्द से कराह रहा था। कर्मचारी ने बताया कि खाली पड़ा दूसरा बिस्तर विप्लव जी के नाम है। हमने उससे कहा कि शायद उसे कोई गलतफहमी हो गई है विप्लव जी के लिए कमरा नंबर १०१ एलॉट हुआ है। कर्मचारी ने रजिस्टर खोल कर दिखा दिया कि नहीं रिकवरी रूम में बेड नंबर दो उनके नाम पर है और उस कमरे में उनके साथ कोई दूसरा दाखिल नहीं हो सकता।
हमने उसकी बात पर अमल से इनकार कर दिया और फिर रिसेप्शन पर चले आए। वहां पहुंच कर हमने कहा कि चार दिन पहले जब बुकिंग सिंगल रूम की कराई गई तो अब हमें रिकवरी रूम में क्यों भेजा जा रहा है? कर्मचारी बात टालने में लगे थे। शायद कोई मोटी आसामी मिल गई थी। गुस्से में हमने हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम करने की प्रक्रिया रोकने को कहा। और वहीं अपने डॉक्टर का इंतज़ार करने लगे। अब सवा बाहर बज रहा था और एक स्ट्रेचर पर मरीज को बरामदे में लाया गया। उसके पैर में गंभीर चोट लगी हुई थी और देखने से ही लग रहा था कि उसे डॉक्टरी मदद की सख्त जरूरत है। लेकिन जिस डॉक्टर से उसका अप्वाइंटमेंट था उसके कमरे के बाहर बारह टाईवालों की लंबी लाइन लग चुकी थी। सब के सब भारी बैग हाथ में लिये हुए थे। अब मरीज के पास इंतजार के अलावा कोई और चारा नहीं था। तभी एक और एमआर वहां पहुंचा। उसने दरवाजे के बाहर खड़े कंपाउंडर से कहा दो-तीन के लॉट में डॉक्टर से मिलने दिया जाए, वर्ना इस तरह तो शाम हो जाएगी. एक के बाद एक एमआर भीतर जाते गए और मरीज बाहर इंतजार करता रहा.
सेहत के बाज़ार का ये घिनौना चेहरा देखकर बाबूजी कांप उठे. उन्होंने कहा कि चाहे कुछ भी हो अब यहां ऑपरेशन नहीं कराएंगे.
Sunday, June 22, 2008
तन सूखा मगर मन भीगा
ये बरसात भी यूं ही निकल जाएगी। इस बरसात भी गांव जाना नहीं हो सकेगा। मन तो काफी चाहता है लेकिन गांव जाने की भूमिका तैयार नहीं हो रही। मतलब इस बरसात भी मैं झिझरी नहीं खेल सकूंगा। गांव से सटी मगई नदी के किनारे नहीं बैठ सकूंगा। बारिश में कुछ चिकनी और मुलायम हुई परती की रेत पर चीका नहीं खेल सकूंगा। वो रेत जो कूदने पर भुरभुरा जाती, बिखर जाती मगर हमें चोट नहीं लगने देती। ये बरसात भी बीते कई साल की तरह यादों के सहारे काटनी होंगी। रोजी रोटी के नाम पर इस बरसात को भी खर्च करना होगा।
मुझे याद है कि बरसात में मगई नदी में उल्टी धारा बहने लगती थी। ये नदी एक छोर पर गंगा में जाकर मिल जाती थी। लेकिन जब गंगा में पानी कुछ ज्यादा उफान मारने लगता था तो मगई में धारा पलट जाती। फिर पानी हमारे गांव को चारों ओर से घेर लेता। कोई पंद्रह-बीस फुट ऊंचाई पर बसे गांव के चारों तरफ आधे किलोमीटर दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता। परती के बाद बगीचे भी पानी में डूब जाते... लगता कि आम, सेमर, सिरफल, कटहल, बरगद, पाकड़ और पीपल सभी पानी पर उगे हों। उन्हीं पेड़ों के बीच मछलियां अपनी खुराक तलाशती और मछलियों के तौर पर इंसान अपनी खुराक। हम लोग भी बंटी (मछली पकड़ने का कांटा) लेकर अपने दुआर के छोर से मछली पकड़ने लगते। घंटों केचुआं कांटे में डाल कर बैठे रहते। किस्मत के हिसाब से रोहू, मांगुर, नैनी, कतला, झींगा ... उन काटों में फंस जातीं। प्रकृति बाढ़ के तौर पर अपनी ताकत के इजहार के साथ ज़िंदगी की नई धारा की रचना भी कर जाती थी। हम सभी उस जीवन धारा का भी लुत्फ उठाते। उससे जुड़ी मुश्किलों से दो-दो हाथ करते हुए।
गंगा का पानी हमें करीब एक से डेढ़ महीने तक इसी तरह घेरे रहता था। पानी घटने के इंतजार में हाथ पर हाथ धर कर बैठा तो रहा नहीं जा सकता। इसलिए लोगों ने बाढ़ के साथ कई तरह के एड्जस्टमेंट किये थे। खुद को पूरी तरह ढाल लिया था। हंसने खेलने के कई नए तरीके ईजाद किये थे। वैसे तो ये तरीके सदियों पुराने थे, लेकिन उनमें वक्त के साथ बदलाव भी हुआ था। ऐसा ही एक खेल था झिझरी। झिझरी की याद आते ही मैं रोमांचित हो उठता हूं। वो खेल ही कुछ ऐसा है, मानों एक बड़े क्रूज पर सवार होकर समंदर के बीच उतरना। क्रूज की ऊंची छत पर सवार होकर आसमान में तारे गिनने जैसा।
आमतौर पर झिझरी अंजोरिया रात में खेलते हैं। ज़्यादातर लोग अंजोरिया रात नहीं समझ सकेंगे। इसे हिंदी में पूर्णिमा और अंग्रेजी में फुल मून नाइट कहते हैं। तब चांद अपने पूरे शबाब पर होता है। अंजोरिया रात में बाढ़ के पानी में चांद कुछ इस तरह अपनी रोशनी घोल देता मानो वो भी आसमान से उतरकर नदी जल से अठखेलियां करना चाहता हो और ये चाहता हो कि संसार उसकी खूबसूरती को पानी में निहार ले। ऐसे की नज़रें ठहर जाती हैं। उसी अंजोरिया रात में नाव पर चौकी रख दी जाती। टॉर्च, लालटेन, ढोल, मझीरे लेकर लोग सवार हो जाते। भगवान राम से प्रार्थना करते हुए, अपनी सलामती की दुआ मांगते हुए।
सिकिया चीरय चिरी
नैया सीरी जवलों
राम सागरवा बांध ना
कवना घाट उतरे हो परदेसिया
राम सागरवा बांध ना
((भगवान इस नाव की हिफाजत करना। लकड़ी को चीर चीर कर बनाई गई ये नाव सागर में चली जा रही है। इस पर सवार परदेसी को किसी घाट पर उतरना है))
...... सुरों में ही इसका जवाब भी दिया जाता
सिकिया चीरय चिरी
नैया सीरी जवलों
राम सागरवा बांध ना
राम घाट उतरे हो परदेसिया
राम सागरवा बांध ना
((भगवान इस नाव की हिफाजत करना। लकड़ी को चीर चीर कर बनाई गई ये नाव सागर में चली जा रही है। इस पर सवार परदेसी राम घाट पर उतरेगा।))
हो सकता हो कि सुरों से सजे उस सवाल जवाब का मतलब मैं ठीक से नहीं समझा सका हूं। लेकिन उसी प्रार्थना के साथ लोग नाव को लहरों में ढकेल देते और जश्न शुरू हो जाता। बीच धारा में ले जाकर नाविक लंगर डालते और नाव लहरों पर झूलने लगती ... ढोल, मझीरे से निकले सुर लहरों में घुलने लगते ... रामायण की चौपाइयां गायी जाने लगती... बीच बीच में जोरदार आवाज़ होती... बोलो सियापति रामचंद्र जी की जै ... एक नई तरंग पैदा होती जो नाव पर होते हुए भी सबको भीगो कर चली जाती ... तन सूखा मगर मन प्रेम और भक्ति रस में डूबा हुआ। हर कोने में चौकी पर नाचते-झूमते लोग और अलग-अलग सुर ... वो संगीत और नाच आज भी जेहन में ताजा है। उसके बारे में लिखते हुए चेहरे पर मुस्कान खिल आई है। मैं अपने बचपन में लौट चुका हूं और कुछ पल के लिए ही सही, उसे जीना चाहता हूं।
तारीख - २२ जून, २००८
दिन - रविवार, वक़्त - १६.१०, जगह - दिल्ली
Saturday, June 21, 2008
मुझसे नई तकदीर ले जाइये
मैं शब्दों का कारोबारी हूं,
मेरे पास हर तरह के शब्द हैं.
पैसे दीजिये,
जरूरत के शब्द ले जाइये.
अगर आपने किसी का क़त्ल किया है,
मगर क़ातिल कहलाने से बचना चाहते हैं,
तो मेरे पास आइये,
मैं क़त्ल को हादसा बता दूंगा.
यकीन मानिये,
शब्दों में बड़ी ताकत होती है,
सारा खेल शब्दों का है,
शब्दों से ही दुनिया चलती है.
मेरी और आपकी बिसात क्या,
शब्द बदलने पर देशों की तकदीर बदल जाती है.
मैं उन्हीं शब्दों को कारोबार करता हूं,
झूठ को सच बनाने के फन में माहिर हूं.
बस आप पैसे फेंकिये,
मुझसे अपनी जरूरत के शब्द,
और अपनी नई तकदीर ले जाइये।
Tuesday, June 17, 2008
शब्द धोखा दे गए
पहला मुद्दा - गीत भाई के ब्लॉग पर एक दिन पहले दुन्या की कविता “कल मैंने एक देश खो दिया” पढ़ी। लगा ये हक़ीक़त मेरी भी है। अपना देस तो मैं भी खो चुका हूं। पूरा नहीं, मगर आधा जरूर। दुन्या के दर्द के दामन को थाम कर बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा हैं, लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी विचारों को एक धागे में पिरो नहीं सका।
दूसरा मुद्दा - सीबीआई के निदेशक विजय शंकर की मीडिया को हद में रहने की हिदायत। एक ऐसी जांच एजेंसी का मुखिया अब मीडिया को नसीहत दे रहा था जो आज तक अपराधियों को बचाने का काम करती आई है। उसकी इतनी हिम्मत हुई तो इसके लिए कुछ हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। मुद्दा काफी बड़ा है और इस पर लिखने को काफी कुछ है, लेकिन कुछ ठोस लिख नहीं सका।
तीसरा मुद्दा - दिल्ली और मुंबई में दो बड़े हादसे हुए। एक झटके में कई ज़िंदगियां, कई परिवार तबाह हो गए और दोनों ही हादसों के लिए शराब जिम्मेदार है। शराब जिसके दंश को मैंने डेढ़ दशक तक भोगा और शराब छोड़ने के बाद भी उसी दंश को भोग रहा हूं। मुद्दा गंभीर है। लिखने का भी काफी मन था। लेकिन लिख नहीं सका।
ऐसा अक्सर होता है। दफ्तर में खबरों के बोझ तले दबे होने के बाद भी जो शब्द साथ नहीं छोड़ते, वही शब्द मन की बात लिखते वक्त रिश्ता तोड़ लेते हैं। परायों सा बर्ताव करने लगते हैं। इस कदर कि दिल कुछ सोचता है, दिमाग कुछ और अंगुलियां कुछ लिखती हैं। आज भी ऐसा ही हुआ। मैं कुछ सार्थक लिखना चाहता था, लेकिन शब्दों ने धोखा दे दिया। आखिर में कुछ मन लायक नहीं लिख सकने के अहसास के साथ कंप्यूटर बंद कर रहा हूं।
तारीख – १७ जून, २००८ (मंगलवार)
वक़्त – २.१०
जगह - दिल्ली
Sunday, June 15, 2008
कभी रात में भी इंडिया गेट जाइये
आज शाम मैं भी वहां गया। पूरे परिवार के साथ। गांव से छह- सात बच्चे आए हुए हैं। वो भी साथ में इंडिया गेट गए। हम सभी यही कोई ढाई घंटा वहां रहे। ये ढाई घंटे बड़ी जल्दी निकल गए। आज मैंने बच्चों को बायोस्कोप दिखाया। मैंने उनसे पूछा कि कभी तुमने बायोस्कोप देखा है क्या? उन्होंने बताया नहीं। बताइये गांव से आए हैं, लेकिन बायोस्कोप कभी नहीं देखा। ये भी कोई बात है। मैंने उनसे कहा इंडिया गेट पर बायोस्कोप देखो। ये हमेशा याद रहेगा। कभी कोई पूछेगा कि बायोस्कोप देखा है तो कहना इंडिया गेट पर देखा है। हमने वहां भेल-पूरी का लुत्फ उठाया और आइस्क्रीम का भी। हालांकि यहां की भेल-पूरी में मंबुई के जुहू बीच वाला चटपटापन नहीं था। लेकिन काफी दिनों बाद भेलपूरी खाने पर मजा आ गया।
शाम में इंडिया गेट मैं कई बार जा चुका हूं। हमारा आठ दोस्तों का ग्रुप था। मैं, अरविंद, राजेश कपूर, दीपांकर, सुधीर शर्मा, सुधीर कुमार, मनीष गोगिया और विकास चावला। हम आठ दोस्तों के अलावा एक मेरा बचपन का मित्र नरेंद्र दानिया भी हमारे साथ होता। कुल नौ लोगों की टोली इंडिया गेट जाती। कार्यक्रम तभी बनता जब किसी का घर खाली हो। इंडिया गेट में शाम बिताने के बाद उसी खाली घर को आबाद करने चले जाते। फिर खूब धमा-चौकड़ी मचाते। भोर तक पार्टी चलती रहती। आज इंडिया गेट जाने पर चंद पलों के लिए वो सभी यादें ताजा हो गईं।
तब और अब के बीच काफी अंतर आ गया है। यहां पहले की तुलना में कुछ ज्यादा लोग जुटने लगे हैं। जुटें भी क्यों नहीं? देश के राजधानी दिल्ली में ऐसी शायद ही कोई खुली जगह है जहां आप बिना किसी झिझक और डर के रात ग्यारह-बारह बजे तक परिवार के साथ रह सकें। वर्ना तो हसीन शाम बिताने के नाम पर यहां सिर्फ यही हो सकता है कि आप किसी सिनेमा या नाटक का टिकट बुक कर लें और उसके बाद किसी बड़े रेस्तरां में खाना खा लें। इंडिया गेट के अलावा कहीं और ज्यादा रात तक खुले में घूमने पर हमेशा खटका लगा रहता है कि मनचलो की कोई टोली आपको तनाव देते हुए गुजर जाएगी।
सुरक्षा के अहसास के मामले में देश की राजधानी दूसरे महानगरों की तुलना में बहुत गरीब है। मुंबई में तो मैं दो साल रहा हूं। मैंने देखा है कि वहां एक साधारण कमाई वाले घर के लोग भी दिल्ली की तुलना में ज्यादा अच्छी जिंदगी जीते हैं। वहां आज भी मीरा रोड और भइंदर में कम किराए पर मकान मिल जाएंगे। फिर शाम को दफ्तर से लौटने के बाद जुहू बीच, बांद्रा, वर्ली सी फेस और मरीन ड्राइव ... ऐसी ढेरों जगहें जहां आप बीवी, बच्चों के साथ जा सकते हैं। रेत पर बच्चों को खेलते, घरौंदा बनाते, कूदते-फांदते देख सकते हैं। इन सभी जगहों पर आधी रात तक रौनक बनी रहती है। यहां गाड़ी वाले भी जाते हैं और बिना गाड़ी वाले भी। जिनके पास कार नहीं है वो लोकल में बैठ कर जाते हैं और साल में इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दीजिये तो कोई वारदात नहीं होती।
अरे मैं भी कहां भटक गया। दिल्ली और मुंबई के बीच क्या अंतर है इस पर मैं कभी और विस्तार से लिखूंगा। फिलहाल तो यही कहना है कि अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो किसी शाम इंडिया गेट जरूर जाइये। अगर दिल्ली आते हैं तो एक शाम इंडिया गेट पर बिताने के इरादे के साथ आइयेगा। नंवबर से फरवरी के बीच की कड़ाके के सर्दी को छोड़ दे तो यहां की रौनक भी देखने लायक होती है।
तारीख - १५ जून, २००८
वक़्त - २३.५०
जगह - दिल्ली
Saturday, June 14, 2008
फिर वही सवाल आप सभी से
१) क्या किसी छात्रा (आरुषि) की हत्या दिलचस्प हो सकती है?
२) क्या उस हत्या की मंशा दिलचस्प हो सकती है?
३) क्या उस हत्या पर बहस दिलचस्प हो सकती है?
उड़न तस्तरी जी मैं थोड़ा खुलासा करता हूं। दरअसल मैंने एक टीवी चैनल पर दो दिग्गज पत्रकारों को सीबीआई के पूर्व निदेशक से बात करते सुना और देखा। वो दोनों दिग्गज पत्रकार चटखारे लेकर आरुषि हत्याकांड पर बात कर रहे थे। उसमें कई बार उन दोनों दिग्गज पत्रकारों ने मजेदार और दिलचस्प शब्दों का इस्तेमाल किया। मुस्कुराते हुए। हाथ मलते हुए। मैं इस समय क़त्ल और क़ातिल कितने तरह के होते हैं और किस मानसिकता में पहुंच कर कोई शख़्स क़ातिल बनता है – इन विषयों पर एक राय बनाने की कोशिश कर रहा हूं। उसी सिलसिले में मैंने आपसे सभी से ये चंद सवाल किये हैं। अगर हो सके तो अपनी राय दें। आपकी राय मुझे किसी नतीजे पर पहुंचने में मदद करेगी।
धन्यवाद।
Thursday, June 12, 2008
वो चांद-तारे और वो जुगनू पकड़ना...
मुझे याद आया अपना बचपन। जब गांव की छत पर मैं सोया करता था। अंधेरिया रात में आसमान में तारे ही तारे नज़र आते। आकाशगंगा में हम तारों के समूह को पहचाने की कोशिश करते। वहीं मैंने सप्तऋषि, तीनडेढ़ियवा और ध्रुव तारे को पहचानना सीखा। आसमान में इन तारों की जगह से हल्का फुल्का वक़्त का अंदाजा लगाना सीखा। आज भी मैं सप्तऋषि और ध्रुवतारे को तुरंत पहचान लेता है। तीनदेढ़ियवा की जगह से वक्त का अंदाजा लगा लेता हूं।
तारों से भरे आसमान के अलावा हमने रात में जुगनू को जगमगाते देखा। दुआर पर मौजूद नीम के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में जुगनू जगमगाते थे। लगता कि तारे आसमान से नीचे उतर आए हैं। जुगनुओं के उस झुंड में से कुछ उड़ते हुए छत पर चले आते तो मैं उन्हें मुट्ठी में बंद कर लेता। वैसे ही जैसे कोई पिता बच्चे के जन्म पर उसे गोद में उठाता है। उत्सुकता और डर के मिले जुले भाव से। मेरी पूरी कोशिश होती की जुगनू के परों को कोई चोट नहीं पहुंचे। फिर अंगुलियों के बीच, मैं, रोशनी को घटते बढ़ते देखता। थोड़ी देर बाद मैं जब मुट्ठी खोलता तो वो जुगनू आसमान में उसी तरह भुक-भुक करते उड़ जाता जैसे कोई बच्चा स्कूल से छुट्टी मिलने पर घर की तरफ भागता है।
सिर्फ जुगनू ही क्यों? बारिश के मौसम में जब मेंढक टर्टराते हुए तालाब से निकल आते तो मैं उन्हें भी पकड़ लेता था। मेरी गिरफ़्त में आने से बचने के लिए मेंढक अपनी पूरी ताकत से छंलाग लगाता। एक के बाद एक कई छलांग। लेकिन मैं उसे भागने नहीं देता। मुट्ठी में बंद होने के बाद मेंढक की छटपटाहट बढ़ जाती। वो बाहर निकलने की पूरी कोशिश करता, थोड़ी देर बाद थक कर सरेंडर कर देता। फिर मौका देख मैं उस मेंढक को किसी साथी की गंजी में डाल देता और मेंढक के साथ उसकी बौखलाहट पर ताली बजाता, ठहाका लगाता। हालांकि ऐसा करने पर कई बार झगड़े की नौबत भी आ जाती थी, लेकिन दोस्ती के उन झगड़ों में भी एक अपनापन हुआ करता था।
बरसात में ही मैंने पालकी वाला नाव बनाना सीखा। उस नाव को दुआर पर जमे पानी में छोड़ देता। एक सींक और चींटा रख कर। फिर हम सब बच्चे वहां जुट जाते। जब चींटा बचने की कोशिश में सींक और नाव के एक छोर से दूसरे छोर पर भागता तो हम कहते कि चींटा नाव चला रहा है। अक्सर ही ऐसा होता कि कागज गलने पर नाव के साथ चींटा डूबने लगता और फिर हम उसे हाथ से पकड़ कर बाहर निकाल देते, उस अंदाज में जैसे कोई शहंशाह किसी गुनहगार को जीवन बख़्श रहा हो।
हमारी ज़िंदगी में ऐसे अनगिनत रंग थे। उन रंगों को समेटने बैठें तो ना जाने कितने पन्ने भर जाएं, मगर वो रंग ख़त्म नहीं हो। लेकिन आज के बच्चों की ज़िंदगी में उतने रंग नहीं है। उनकी दिनचर्या तो मशीनी अंदाज में चलती है। सुबह छह बजे जगने से लेकर शाम चार बजे तक वक़्त स्कूल के नाम। लौटने पर होमवर्क। उसके बाद एक से डेढ़ घंटा क्रिकेट और थोड़ी देर के लिए कार्टून नेटवर्क या डिस्करी चैनल। फिर दस बजे खाना खाकर सो जाना। कई बार लगता है कि पढ़ाई और रोजी रोटी के चक्कर में हमने बच्चों की ज़िंदगी से ना जाने कितने रंग छीन लिये हैं।
तारीख - १२ जून, २००८
समय - ०६.०५
दिन - बुधवार
जगह - दिल्ली
